अतिथि
मेरी पत्नी मुझे कभी भी अकेले छोड़ कर अपने मायके नहीं जाती थी ! लेकिन इस बार जाना पड़ा कुछ दिनों के लिए !
बरसात का मौसम और छुट्टी का दिन और पत्नी का घर में नहोना यह एक संजोग ही था की मेरे मन में एक ख़याल आया, क्योंना दोपहर को रिमझिम बरसते पानी को देखते हुए थोड़ा मदिरा पिया जाए ! लेकिन मदिरा अकेले पीने में कोई लुफ्त नहीं है ! मै कोई पियक्क्ड़ नहीं हूँ लेकिन कभी कभार थोड़ा पीकर (हलके नशे में मस्त ) होने में जिसे अंग्रेजी में tipsy कहते हैं, अच्छा लगता है ! क्या करू किसे बुलाऊँ सोचते हुए अपने डोलन कुर्सी में डोल रहा था ! दुबिधा यह थी की मै अपने मित्रो में से किसीको अपने आबास में नहीं बुला सकता था कयोकि हमलोग कितना भी सावधानी बरते यह समाचार लीक हो ही जायेगा और पत्नी के वापस आने पर मुझे इस कारनामे का मुआबजा भरना पड़ेगा.! इससे अच्छा यह होगा की बढ़िया कॉफी बनाकर पिया जाये ! इस उधेड़बुन के साथ कुर्सी में डोलते हुए मैंने खिड़की से देखा की एक सज्जन कुर्ते पैजामे में हाथ में एक झोला लिए, मेरे गलियारे में खड़ा पानी के छींटे से बचने का प्रयास कर रहा हैं ! मै उठ कर दरवाजा खोल कर कहा अंदर आइये श्रीमान, वह अतिथि भगवान आकर मेरे सोफे पर सकुचाते हुए बैठ गया और मुझे दन्यबाद कहा I सज्जन देखने में सुन्दर और शालीन था I उसका चेहरा हमारे सहकर्मी श्री बाबूलाल मेंहर जैसा था ! मैंने पूंछा आपका नाम कया है और आप कँहा जाना चाहते हैं ? उसने कहा मेरा नाम कृष्णा साहु है और मै अपने मित्र श्री देवांगन जो बालको में एलुमिना प्लांट में काम करते हैं उनके पास आया था लेकिन उन्हें क्वार्टर में न पाकर मै वापस अपने घर जा रहा हूँ ! मैंने अतिथि से कहा तब तो आप मेरे मेहमान हैं और मेरे साथ रह कर आपने मित्र का इंतज़ार कर सकते हैं.मैंने निबेदन किया आप कुछ पीयेंगे चाय या कॉफी मेरे साथ ?, मेरी पत्नी मायके गई हुई है और मुझे खाना बनाना नहीं आता है ! कृष्णा साहु ने बिनम्रता से कहा मुझे आता है और आप चाहेंगे तो मै कुछ पका सकता हूँ, मैंने कहा नेकी और पुंछ पुंछ, वह तपाक से उठा और किचन के तरफ अपने झोले के साथ घुस गया ! मैंने भगव!न को धन्यवाद दिया की आज होटल नहीं जाना पड़ेगा ! हम दोनों ने छक कर खिचड़ी और चोखा खाया! हम दोनों में काफी सहजता बन गई थी और मैंने खाने के बाद फिर पूंछा कुछ लेंगे आप कॉफी या -- कृष्णा जी ने मेरे प्रश्न का जबाब थोड़ा इस तरह दिया "कया है आप के पास" ? चूँकि अब हम लोग दोस्त बन चुके थे मैंने थोड़ा चुटकी लेते हुए कहा इम्पोर्टेड अंग्रेजी है,कृष्णा जी ने मुह बनाकर कहा अंग्रेजी ! उसमे कया होगा, मैंने, "आओ देखा न ताओ" झट से उसे रम की बोतल थमा दिया और कहा जितना पीना है पीलो ! कृष्णा जी ने कहा अकेले ? [मैंने सोचा अब आया ऊंट पहर के नीचे बच्चू को पता चलेगा की 40 UP मिलिट्री रम कया होता है] लेकिन ये कया कृष्णा जी ने पूरी बोतल गटगटाकर पी लिया और मेरे तरफ देखते हुए पूंछा "और कुछ है केया" ? मैंने आस्चर्य होकर कहा देखता हूँ ! और सोचने लगा इस तरह तो मेरे मित्र कर्नल पुरुषोत्तम जी भी नहीं पी पाएंगे ! फिर भी मैंने अपनी अलमारी खोली उसमे मेरे दादा जी के समय का अफीम का दो गोला लाकर उसे दिया,कृष्णा जी की आँखे चमकी और उसने दोनों गोलों को टॉफ़ी की तरह अपने दोनों गालो में फंसाकर चूसने लगा और कहा "और कुछ है कॅया" मै डर गया और सोचने लगा कंही यह मर गया तो देवांगन जी को कहूँगा ! शायद कृष्णा जी मेरे मन को भांप गए और मुझे धीरज देते हुए कहा आप निश्चिन्त रहें मुझे कुछ नहीं होगा ! और पूंछा "और कुछ है कया " ?
मैंने हाँथ जोर कर कहा अतिथि देव मुझे माफ़ करे इस गरीब के पास और कुछ नहीं जो आप को दे संके ! कृष्णा जी ने कहा कोई बात नहीं डाक्टर मैत्रा, मै आप के अतिथि सेवा से प्रसन्न हुआ ! आप को बर देता हूँ की आप को अपने प्रतिष्ठान में पूरी मान्यता मिलेगी और आप के सहजोगी मित्र और दुश्मन भी आप की सराहना करेंगे कहते हुए उन्होंने अपने जेब से एक छोटी सी डिबिया निकली और उसका ढक्कन उठाया उसमे से एक सपोले ने छोटा सा फन निकाला ,कृष्णा जी ने सपोले से अपने नाक पर दंश करवाया, डिबिया को बंद कर अपने जेब में रखा और झोले से एक चादर निकालकर ओढ़ लिया और मुझसे कहा मान्यवर अब मुझे नींद आ रही है यह कहकर सो गया ! मै अपने कुर्सी में बैठा रहा और सोचता रहा यह कैसा आदमी है ! अचानक पत्नी जी की पुकार से नींद खुली वह चिल्ला रही थी यह कैसा आदमी है जो दरवज्जा खोलकर सो रहा था, मैंने पत्नी से पूंछा तुम कब आई ? उसने कहा मै चं!पा स्टेशन में उतरी तो देखा बालको की कार खड़ी थी ड्राइवर ने मुझे पहचान लिया और घर पंहुचा दिया !
और मैंने कहा कृष्णा जी कँहा गए , पत्नी जी ने कहा कौन कृष्णा ? मैंने कहा कृष्णा मेरा दोस्त वह रात को सोफे पर लेटा था ! पत्नी ने कहा सोफे पर कोई नहीं था लेकिन एक झोला पड़ा था, मैंने झोले में देखा एक पत्र था जिसमे लिखा था मान्यबर मै जा रहा हूँ, आप सो रहे थे तो जगाया नहीं आप ने कल रात को मुझे आपने घर में ठहराकर मेरा उपकार किया है !हमारी मित्रता की निशानी आप के लिए झोले में छोड़ रहा हूँ , डरिये नहीं इसमें सपोला नहीं है ! मैंने देखा डिबिया में एक पत्थर जड़ा अंगूठी है जो मेरे ऊँगली में सही फिट हो रहा था !
मैंने अंगूठी को अलमारी में रख दिया और भूल भी गया !
बरसो बीत गए , फिर मेरे एक मित्र श्री रामगोपाल स्वर्णकार मेरे घर आये तो मित्रता की चर्चा हो रही थी तो मेरे पत्नी ने कृष्णा जी की बात बताई.और अंगूठी दिखाया स्वर्णकार जी अंगूठी कोरबा में जाकर दुकान में जाँच करबाई और मुझे फ़ोन किया और बताया की दुकानदार इस अंगूठी का २ लाख रुपये की पेशकश की है ! लेकिन मैंने अंगूठी बेचीं नहीं ! पता नहीं कब कृष्णा जी आजाये और अपनी निशानी को देखना चाहे !
By Dr P K Maitra.
बरसात का मौसम और छुट्टी का दिन और पत्नी का घर में नहोना यह एक संजोग ही था की मेरे मन में एक ख़याल आया, क्योंना दोपहर को रिमझिम बरसते पानी को देखते हुए थोड़ा मदिरा पिया जाए ! लेकिन मदिरा अकेले पीने में कोई लुफ्त नहीं है ! मै कोई पियक्क्ड़ नहीं हूँ लेकिन कभी कभार थोड़ा पीकर (हलके नशे में मस्त ) होने में जिसे अंग्रेजी में tipsy कहते हैं, अच्छा लगता है ! क्या करू किसे बुलाऊँ सोचते हुए अपने डोलन कुर्सी में डोल रहा था ! दुबिधा यह थी की मै अपने मित्रो में से किसीको अपने आबास में नहीं बुला सकता था कयोकि हमलोग कितना भी सावधानी बरते यह समाचार लीक हो ही जायेगा और पत्नी के वापस आने पर मुझे इस कारनामे का मुआबजा भरना पड़ेगा.! इससे अच्छा यह होगा की बढ़िया कॉफी बनाकर पिया जाये ! इस उधेड़बुन के साथ कुर्सी में डोलते हुए मैंने खिड़की से देखा की एक सज्जन कुर्ते पैजामे में हाथ में एक झोला लिए, मेरे गलियारे में खड़ा पानी के छींटे से बचने का प्रयास कर रहा हैं ! मै उठ कर दरवाजा खोल कर कहा अंदर आइये श्रीमान, वह अतिथि भगवान आकर मेरे सोफे पर सकुचाते हुए बैठ गया और मुझे दन्यबाद कहा I सज्जन देखने में सुन्दर और शालीन था I उसका चेहरा हमारे सहकर्मी श्री बाबूलाल मेंहर जैसा था ! मैंने पूंछा आपका नाम कया है और आप कँहा जाना चाहते हैं ? उसने कहा मेरा नाम कृष्णा साहु है और मै अपने मित्र श्री देवांगन जो बालको में एलुमिना प्लांट में काम करते हैं उनके पास आया था लेकिन उन्हें क्वार्टर में न पाकर मै वापस अपने घर जा रहा हूँ ! मैंने अतिथि से कहा तब तो आप मेरे मेहमान हैं और मेरे साथ रह कर आपने मित्र का इंतज़ार कर सकते हैं.मैंने निबेदन किया आप कुछ पीयेंगे चाय या कॉफी मेरे साथ ?, मेरी पत्नी मायके गई हुई है और मुझे खाना बनाना नहीं आता है ! कृष्णा साहु ने बिनम्रता से कहा मुझे आता है और आप चाहेंगे तो मै कुछ पका सकता हूँ, मैंने कहा नेकी और पुंछ पुंछ, वह तपाक से उठा और किचन के तरफ अपने झोले के साथ घुस गया ! मैंने भगव!न को धन्यवाद दिया की आज होटल नहीं जाना पड़ेगा ! हम दोनों ने छक कर खिचड़ी और चोखा खाया! हम दोनों में काफी सहजता बन गई थी और मैंने खाने के बाद फिर पूंछा कुछ लेंगे आप कॉफी या -- कृष्णा जी ने मेरे प्रश्न का जबाब थोड़ा इस तरह दिया "कया है आप के पास" ? चूँकि अब हम लोग दोस्त बन चुके थे मैंने थोड़ा चुटकी लेते हुए कहा इम्पोर्टेड अंग्रेजी है,कृष्णा जी ने मुह बनाकर कहा अंग्रेजी ! उसमे कया होगा, मैंने, "आओ देखा न ताओ" झट से उसे रम की बोतल थमा दिया और कहा जितना पीना है पीलो ! कृष्णा जी ने कहा अकेले ? [मैंने सोचा अब आया ऊंट पहर के नीचे बच्चू को पता चलेगा की 40 UP मिलिट्री रम कया होता है] लेकिन ये कया कृष्णा जी ने पूरी बोतल गटगटाकर पी लिया और मेरे तरफ देखते हुए पूंछा "और कुछ है केया" ? मैंने आस्चर्य होकर कहा देखता हूँ ! और सोचने लगा इस तरह तो मेरे मित्र कर्नल पुरुषोत्तम जी भी नहीं पी पाएंगे ! फिर भी मैंने अपनी अलमारी खोली उसमे मेरे दादा जी के समय का अफीम का दो गोला लाकर उसे दिया,कृष्णा जी की आँखे चमकी और उसने दोनों गोलों को टॉफ़ी की तरह अपने दोनों गालो में फंसाकर चूसने लगा और कहा "और कुछ है कॅया" मै डर गया और सोचने लगा कंही यह मर गया तो देवांगन जी को कहूँगा ! शायद कृष्णा जी मेरे मन को भांप गए और मुझे धीरज देते हुए कहा आप निश्चिन्त रहें मुझे कुछ नहीं होगा ! और पूंछा "और कुछ है कया " ?
मैंने हाँथ जोर कर कहा अतिथि देव मुझे माफ़ करे इस गरीब के पास और कुछ नहीं जो आप को दे संके ! कृष्णा जी ने कहा कोई बात नहीं डाक्टर मैत्रा, मै आप के अतिथि सेवा से प्रसन्न हुआ ! आप को बर देता हूँ की आप को अपने प्रतिष्ठान में पूरी मान्यता मिलेगी और आप के सहजोगी मित्र और दुश्मन भी आप की सराहना करेंगे कहते हुए उन्होंने अपने जेब से एक छोटी सी डिबिया निकली और उसका ढक्कन उठाया उसमे से एक सपोले ने छोटा सा फन निकाला ,कृष्णा जी ने सपोले से अपने नाक पर दंश करवाया, डिबिया को बंद कर अपने जेब में रखा और झोले से एक चादर निकालकर ओढ़ लिया और मुझसे कहा मान्यवर अब मुझे नींद आ रही है यह कहकर सो गया ! मै अपने कुर्सी में बैठा रहा और सोचता रहा यह कैसा आदमी है ! अचानक पत्नी जी की पुकार से नींद खुली वह चिल्ला रही थी यह कैसा आदमी है जो दरवज्जा खोलकर सो रहा था, मैंने पत्नी से पूंछा तुम कब आई ? उसने कहा मै चं!पा स्टेशन में उतरी तो देखा बालको की कार खड़ी थी ड्राइवर ने मुझे पहचान लिया और घर पंहुचा दिया !
और मैंने कहा कृष्णा जी कँहा गए , पत्नी जी ने कहा कौन कृष्णा ? मैंने कहा कृष्णा मेरा दोस्त वह रात को सोफे पर लेटा था ! पत्नी ने कहा सोफे पर कोई नहीं था लेकिन एक झोला पड़ा था, मैंने झोले में देखा एक पत्र था जिसमे लिखा था मान्यबर मै जा रहा हूँ, आप सो रहे थे तो जगाया नहीं आप ने कल रात को मुझे आपने घर में ठहराकर मेरा उपकार किया है !हमारी मित्रता की निशानी आप के लिए झोले में छोड़ रहा हूँ , डरिये नहीं इसमें सपोला नहीं है ! मैंने देखा डिबिया में एक पत्थर जड़ा अंगूठी है जो मेरे ऊँगली में सही फिट हो रहा था !
मैंने अंगूठी को अलमारी में रख दिया और भूल भी गया !
बरसो बीत गए , फिर मेरे एक मित्र श्री रामगोपाल स्वर्णकार मेरे घर आये तो मित्रता की चर्चा हो रही थी तो मेरे पत्नी ने कृष्णा जी की बात बताई.और अंगूठी दिखाया स्वर्णकार जी अंगूठी कोरबा में जाकर दुकान में जाँच करबाई और मुझे फ़ोन किया और बताया की दुकानदार इस अंगूठी का २ लाख रुपये की पेशकश की है ! लेकिन मैंने अंगूठी बेचीं नहीं ! पता नहीं कब कृष्णा जी आजाये और अपनी निशानी को देखना चाहे !
By Dr P K Maitra.
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