अपना पराया
सुधाजी की जब शादी हुई तब उनका पति अभिनाश जुनिअर अफसर हुआ करते थे ! और सास ससुर के साथ किराये की मकान में रहा करते थे !पुराना मकान था और किराया भी कम था !जब अभिनाश का प्रमोशन हुआ तो उसने सुधाजी से कहा अब हमको जयादा मकान भाड़ा मिलेगा क्यू न हम बड़े फ्लैट में शिफ्ट कर जाये ?
लेकिन सुधाजी ने बड़े फ्लैट में जाने से मना कर दिया और कहा तुम कंपनी से लोन लेकर एक अच्छा फ्लैट बुक कर दो ! माताजी का इस फ्लैट से काफी यादे जुड़े है हम लोग भी पड़ोसियों के साथ काफी घुल मिल गए है ! चार पांच साल थोड़ा संचय कर लेंगे तो आगे काम आएगा !अभिनाश को सुधा का सुझाव पसंद आया और उसने कंपनी से लोन लेने का फैसला किया !नया फ्लैट मिलने में करीब सात साल लग गए और नए मकान में शिफ्ट करते ही घर का खर्च कम हो गया ! इस बीच सुधाजी के दो पुत्र राजीब और संजीब पैदा हुए और सास ससुर भी स्वर्गवासी हो गए !कंपनी का लोन समाप्त होते ही अभिनाश ने फ्लैट सुधाजी के नाम करवा दिया ! राजीव
और संजीव बड़े हुए तो सुधा जी ने अपने सहेली के बेटी अंकिता के साथ राजीव की शादी करवादी !अंकिता घर में सब की सेबा करती थी और सबको खुश रखना चाहती थी ! लेकिन सुधाजी को अंकिता का सावला होना मन को कचोटती थी ! सोचती थी मै सहेली के चक्कर में आकर सावली बहु घर ले आई ! अंकिता सीधी साधी लड़की थी जो कुछ भी कहती उसमे कोई बनाबटी बात नहीं होती थी ! अब क्या था सुधाजी ने तै किया की संजीव की शादी एक गोरी लड़की से करुँगी ! पांच साल बाद संजीब की शादी प्रिया नाम की लड़की से हो गई ! प्रिया आधुनिक लड़की जो पढ़ी लिखी और सूंदर थी सुधाजी को पसंद आई ! प्रिया की मीठी मीठी बाते सुधाजी को इतनी अच्छी लगती थी की अंकिता की घरेलु कथोपकथन सुधाजी के कानो में चुभती थी और अंकिता को सलाह देती थी की प्रिया जैसी बाते करो ! प्रिया घर का कोई काम नहीं करती थी ! सब काम अंकिता करती थी, फिर भी सास का मन जीत नहीं पाती थी क्यू कि वह सावली थी ! राजीब सब समझता था लेकिन मा के मन को ठेस न पहुंचे इस लिए चुप रहता था !
धीरे धीरे समय बीता और सुधा को लगने लगा की प्रिया हमेशा अपने कमरे में रहती और जब कभी भी खाना परोसने का वख्त आता रसोई में घुसकर खाना लेकर परोसने लगती सबको यह लगता था की प्रिया ने आज खाना बनाया है ! सब खाने की तारीफ करते और प्रिया कभी भी नहीं कहती की यह खाना अंकिता ने बनाया है !
एकबार अंकिता को मलेरिआ हो गया और उसने खाट पकड़ लिया ! प्रिया ने दो एक दिन खाना बनाया लेकिन सबको समझमे आगया की वह खाना नहीं बना सकती थी !प्रिया कुछ दिन होटल से खाना मंगाया केकिन होटल का बिल इतना ज्यादा होता था की संजीव ने रोज रोज होटल से खाना मंगवाने से साफ़ मना कर दिया और कहा की अब प्रिया को ही खाना बनाना होगा ! इधर अंकिता का बुखार कम नहीं हो रहा था ! उस रात प्रिया ने इतना घटिया खाना बनाया की कोई भी खाना नहीं खा सका ! संजीव ने सबके सामने प्रिया को डांट कर कहा प्रिया तुम अपने मायके चले जाओ तुम्हारी यहाँ कोई जरूरत नहीं है !और कह देता हूँ की जब तक तुम खाना बनाना नहीं सीख जाती वही रहना ! सुधा जी ने कहा यह क्या बात हुई खाना नहीं बनाना आता तो उसे मायके भेज दोगे ? कल से मै प्रिया को खाना बनाना सिखलाऊँगी !
दूसरे दिन सुधाजी ने प्रिया को नहा धोके चौके में बुलाया प्रिया बहुत देर कर आई ! सुधा जी ने कहा इतने देर से आओगी तो सब को बगैर खाये पिए दफ्तर जाना पड़ेगा !पर प्रिया को इस बात का फ़िक्र काहां था ! वह बहाना बना कर अपने कमरे में चली जाती थी ! अब धीरे धीरे अंकिता के बीमारी में सुधार होने लगा और वह रसोई में आकर सास को काम में मदत करने लगी !घरवालों की जान में जान आई !
इत्तफाक से अंकिता के ठीक होते ही सुधाजी को पुराना पेट की गाल ब्लैडर का दर्द उठने लगा और उसे हॉस्पिटल में आपरेशन के लिए भर्ती करना पड़ा !अंकिता सास के साथ अस्पताल जाकर रहने लगी ! एक हप्ता बाद सुधाजी घर लौटी !अंकिता सास की सेबा करती और घर का काम भी करती थी ! जब सुधाजी ठीक हुई तब
उसने अंकिता को अपने पास बुलाया और उसका हाँथ को अपने हाथ में लेकर रोने लगी और कहने लगी बेटी अंकिता तू मेरी बेटी है ! और मैंने तुझे कितना भला बुरा कहा तू मुझे माफ़ करदे, तूने यह साबित कर दिया की तेरा दिल कितना सूंदर है ! अंकिता ने भी रोते हुए कहा मम्मी जी आप मेरी माँ पहले भी थी आज भी हैं और हमेशा रहेंगी ! सुधाजी बोली बेटी तेरे बीमारी से हम सब को पता लगा की तेरी क्या अहमियत है, और मेरी बीमारी से पता चला की तू कितनी कोमल और दयालु है !
अंकिता ने रात का खाना बनाया और सबको खाना खाने के लिए बुलाया लेकिन प्रिया ने आकर बताया की आज वह और संजीब रात का खाना नहीं खाएंगे ! सब खाने बैठे तो सुधाजी ने कहा मै देखती हूँ संजीब जरूर खायेगा यह कहकर वह प्रिया के कमरे के पास पहुंची, और सुना प्रिया कह रही थी संजीब अगले महीने हम लोंगो को इस घर से अलग होना है मै तुम्हारे खूसट बुढ़िया मम्मी के साथ नहीं रह सकती अब वह बीमार होती ही रहेगी मै दीदी की तरह उनकी सेबा नहीं कर सकती हूँ ! सुधाजी पर्दा हटाके अंदर घुसी तो देखा प्रिया और संजीब होटल का खाना खा रहे है !
सुधाजी को देखकर दोनों सन्न हो गए ! सुधाजी ने रोष पुर्बक दोनों को देखा और कहा खाना खाकर दोनों बहार आओ जरूरी बात करनी है ! जब दोनों बाहर आये तो सुधाजी ने कहा सुनो संजीब मै तुझे कह रही हूँ मै तुझे इस घर से बेदखल कर रही हूँ तेरी पत्नी को इस खूंसट बुढ़िया की सेबा नहीं करनी है और न तुझे अपनी आत्म सन्मान खोकर इस बदजुबान औरत का समर्थन करना है !यह मकान मेरा है तेरे पिता का नहीं इस माकन पर तुम लोंगो का कोई अधिकार नहीं है ! मै अपने मकान को अपनी बेटी अंकिता को दे रही हूँ ! संजीब बोला माँ तुम ऐसा कैसे कर सकती हो मै तुम्हारा बेटा हूँ ! सुधाजी बोली क्यू नहीं कर सकती वैसे भी तुम लोग अगले महीने से अलग होने वाले हो न ? और अभी बहाना बनाकर घर का खाना छोड़ होटल का खाना खा रहे थे न ? इस हरकत से तुम लोंगो ने यह सिद्ध कर दिया की तुम दोनों इस घर के सदस्य नहीं मेहमान हो और मेहमानो का बिदा होने का समय आगया है !
लेखक-ड:प्रदीप कुमार मैत्रा २५/४/१८
सुधाजी की जब शादी हुई तब उनका पति अभिनाश जुनिअर अफसर हुआ करते थे ! और सास ससुर के साथ किराये की मकान में रहा करते थे !पुराना मकान था और किराया भी कम था !जब अभिनाश का प्रमोशन हुआ तो उसने सुधाजी से कहा अब हमको जयादा मकान भाड़ा मिलेगा क्यू न हम बड़े फ्लैट में शिफ्ट कर जाये ?
लेकिन सुधाजी ने बड़े फ्लैट में जाने से मना कर दिया और कहा तुम कंपनी से लोन लेकर एक अच्छा फ्लैट बुक कर दो ! माताजी का इस फ्लैट से काफी यादे जुड़े है हम लोग भी पड़ोसियों के साथ काफी घुल मिल गए है ! चार पांच साल थोड़ा संचय कर लेंगे तो आगे काम आएगा !अभिनाश को सुधा का सुझाव पसंद आया और उसने कंपनी से लोन लेने का फैसला किया !नया फ्लैट मिलने में करीब सात साल लग गए और नए मकान में शिफ्ट करते ही घर का खर्च कम हो गया ! इस बीच सुधाजी के दो पुत्र राजीब और संजीब पैदा हुए और सास ससुर भी स्वर्गवासी हो गए !कंपनी का लोन समाप्त होते ही अभिनाश ने फ्लैट सुधाजी के नाम करवा दिया ! राजीव
और संजीव बड़े हुए तो सुधा जी ने अपने सहेली के बेटी अंकिता के साथ राजीव की शादी करवादी !अंकिता घर में सब की सेबा करती थी और सबको खुश रखना चाहती थी ! लेकिन सुधाजी को अंकिता का सावला होना मन को कचोटती थी ! सोचती थी मै सहेली के चक्कर में आकर सावली बहु घर ले आई ! अंकिता सीधी साधी लड़की थी जो कुछ भी कहती उसमे कोई बनाबटी बात नहीं होती थी ! अब क्या था सुधाजी ने तै किया की संजीव की शादी एक गोरी लड़की से करुँगी ! पांच साल बाद संजीब की शादी प्रिया नाम की लड़की से हो गई ! प्रिया आधुनिक लड़की जो पढ़ी लिखी और सूंदर थी सुधाजी को पसंद आई ! प्रिया की मीठी मीठी बाते सुधाजी को इतनी अच्छी लगती थी की अंकिता की घरेलु कथोपकथन सुधाजी के कानो में चुभती थी और अंकिता को सलाह देती थी की प्रिया जैसी बाते करो ! प्रिया घर का कोई काम नहीं करती थी ! सब काम अंकिता करती थी, फिर भी सास का मन जीत नहीं पाती थी क्यू कि वह सावली थी ! राजीब सब समझता था लेकिन मा के मन को ठेस न पहुंचे इस लिए चुप रहता था !
धीरे धीरे समय बीता और सुधा को लगने लगा की प्रिया हमेशा अपने कमरे में रहती और जब कभी भी खाना परोसने का वख्त आता रसोई में घुसकर खाना लेकर परोसने लगती सबको यह लगता था की प्रिया ने आज खाना बनाया है ! सब खाने की तारीफ करते और प्रिया कभी भी नहीं कहती की यह खाना अंकिता ने बनाया है !
एकबार अंकिता को मलेरिआ हो गया और उसने खाट पकड़ लिया ! प्रिया ने दो एक दिन खाना बनाया लेकिन सबको समझमे आगया की वह खाना नहीं बना सकती थी !प्रिया कुछ दिन होटल से खाना मंगाया केकिन होटल का बिल इतना ज्यादा होता था की संजीव ने रोज रोज होटल से खाना मंगवाने से साफ़ मना कर दिया और कहा की अब प्रिया को ही खाना बनाना होगा ! इधर अंकिता का बुखार कम नहीं हो रहा था ! उस रात प्रिया ने इतना घटिया खाना बनाया की कोई भी खाना नहीं खा सका ! संजीव ने सबके सामने प्रिया को डांट कर कहा प्रिया तुम अपने मायके चले जाओ तुम्हारी यहाँ कोई जरूरत नहीं है !और कह देता हूँ की जब तक तुम खाना बनाना नहीं सीख जाती वही रहना ! सुधा जी ने कहा यह क्या बात हुई खाना नहीं बनाना आता तो उसे मायके भेज दोगे ? कल से मै प्रिया को खाना बनाना सिखलाऊँगी !
दूसरे दिन सुधाजी ने प्रिया को नहा धोके चौके में बुलाया प्रिया बहुत देर कर आई ! सुधा जी ने कहा इतने देर से आओगी तो सब को बगैर खाये पिए दफ्तर जाना पड़ेगा !पर प्रिया को इस बात का फ़िक्र काहां था ! वह बहाना बना कर अपने कमरे में चली जाती थी ! अब धीरे धीरे अंकिता के बीमारी में सुधार होने लगा और वह रसोई में आकर सास को काम में मदत करने लगी !घरवालों की जान में जान आई !
इत्तफाक से अंकिता के ठीक होते ही सुधाजी को पुराना पेट की गाल ब्लैडर का दर्द उठने लगा और उसे हॉस्पिटल में आपरेशन के लिए भर्ती करना पड़ा !अंकिता सास के साथ अस्पताल जाकर रहने लगी ! एक हप्ता बाद सुधाजी घर लौटी !अंकिता सास की सेबा करती और घर का काम भी करती थी ! जब सुधाजी ठीक हुई तब
उसने अंकिता को अपने पास बुलाया और उसका हाँथ को अपने हाथ में लेकर रोने लगी और कहने लगी बेटी अंकिता तू मेरी बेटी है ! और मैंने तुझे कितना भला बुरा कहा तू मुझे माफ़ करदे, तूने यह साबित कर दिया की तेरा दिल कितना सूंदर है ! अंकिता ने भी रोते हुए कहा मम्मी जी आप मेरी माँ पहले भी थी आज भी हैं और हमेशा रहेंगी ! सुधाजी बोली बेटी तेरे बीमारी से हम सब को पता लगा की तेरी क्या अहमियत है, और मेरी बीमारी से पता चला की तू कितनी कोमल और दयालु है !
अंकिता ने रात का खाना बनाया और सबको खाना खाने के लिए बुलाया लेकिन प्रिया ने आकर बताया की आज वह और संजीब रात का खाना नहीं खाएंगे ! सब खाने बैठे तो सुधाजी ने कहा मै देखती हूँ संजीब जरूर खायेगा यह कहकर वह प्रिया के कमरे के पास पहुंची, और सुना प्रिया कह रही थी संजीब अगले महीने हम लोंगो को इस घर से अलग होना है मै तुम्हारे खूसट बुढ़िया मम्मी के साथ नहीं रह सकती अब वह बीमार होती ही रहेगी मै दीदी की तरह उनकी सेबा नहीं कर सकती हूँ ! सुधाजी पर्दा हटाके अंदर घुसी तो देखा प्रिया और संजीब होटल का खाना खा रहे है !
सुधाजी को देखकर दोनों सन्न हो गए ! सुधाजी ने रोष पुर्बक दोनों को देखा और कहा खाना खाकर दोनों बहार आओ जरूरी बात करनी है ! जब दोनों बाहर आये तो सुधाजी ने कहा सुनो संजीब मै तुझे कह रही हूँ मै तुझे इस घर से बेदखल कर रही हूँ तेरी पत्नी को इस खूंसट बुढ़िया की सेबा नहीं करनी है और न तुझे अपनी आत्म सन्मान खोकर इस बदजुबान औरत का समर्थन करना है !यह मकान मेरा है तेरे पिता का नहीं इस माकन पर तुम लोंगो का कोई अधिकार नहीं है ! मै अपने मकान को अपनी बेटी अंकिता को दे रही हूँ ! संजीब बोला माँ तुम ऐसा कैसे कर सकती हो मै तुम्हारा बेटा हूँ ! सुधाजी बोली क्यू नहीं कर सकती वैसे भी तुम लोग अगले महीने से अलग होने वाले हो न ? और अभी बहाना बनाकर घर का खाना छोड़ होटल का खाना खा रहे थे न ? इस हरकत से तुम लोंगो ने यह सिद्ध कर दिया की तुम दोनों इस घर के सदस्य नहीं मेहमान हो और मेहमानो का बिदा होने का समय आगया है !
लेखक-ड:प्रदीप कुमार मैत्रा २५/४/१८