दोस्ती -पार्ट--1 13/6/22
Monday, June 13, 2022
दोस्ती
Wednesday, June 1, 2022
स्वीकारोक्ति
स्वीकारोक्ति।
अर्नब ट्रेन से जैसे ही ट्रेन से उतरा, तेज बारिश शुरू हो गई। स्टेशन छोटा था, और सिर्फ एक शेड था और तेजी से शेड के एक तरफ चला गया। उसने वहां एक महिला को भी ट्रेन से उतरते देखा था । अर्नबने बैग नीचे रखा और एक सिगरेट हाँथ में पकड़ ली। इस सुनसान स्टेशन पर सिगरेट पीना सुरक्षित है। स्टेशन पर सिर्फ चार प्राणी है । तीन मनुष्य और एक कुत्ता । शेड के नीचे दो लंबी बेंच हैं। एक कुत्ता जितना हो सके अपने शरीर को गोलाकर कर बेंच के नीचे लेटा है। एक महिला दूसरी बेंच पर बच्चे को गोद में लेकर बैठी है। वह बार बार बारिस से उत्पन्न पानी का छींटा से राहत पाने का प्रबंध करती दिखाई दे रही है। बच्चे का चेहरा साड़ी के आँचल से ढका हुआ है। काली अँधेरी बारिश ने अचानक यौवन की शाम को किसी तरह से एक पूरी रात में बदल दिया। बारिश की तीव्रता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी ।
अचानक महिला बोली "यहाँ आप हैं, सुन रहे हैं न ? ..."अर्नब को अचानक लगा जैसे कोई उसे बुला रही है। शेड पर लगातार बारिश की आवाज से , महिला की उस पुकार का स्रोत बहुत अस्पष्ट लग रहा था। उस महिला के अलावा स्टेशन पर और कोई नहीं था । अतः अर्नब ने महिला के पास आकर पूंछा "क्या आप मुझे कुछ कह रही हैं? "अर्नब जोर-जोर से अनजान महिला का मकसद पूछता है।
स्टेशन पर ज्यादा रोशनी नहीं थी । दूर के लैम्प पोस्ट से प्रकाश का एक टुकड़ा आ रहा था । उसी रौशनी में अर्नब ने महिला को देखा -एक दुबली पतली, बीमार शरीर, मानो रक्ताल्पता Anaemia द्वारा निगल लिया गया हो। साड़ी भी मैली है, लेकिन चेहरा साफ नहीं देखाई दे रही थी ! अब महिला ने कहा "क्या आप मेरी कुछ मदत कर सकते हैं?""हाँ, मेरा कहना है, अगर आप बुरा न मानें तो एक अनुरोध है।" आवाज सुरीली है लेकिन कहीं न कहीं छिपी इच्छा है। "यह कहना चाहती हूँ की ।""मेरे पास एक छतरी है, क्या आप मुझे बाहर से एक रिक्शा दिला सकते हैं।"
अर्नब ने कहा "लेकिन इस रात में क्या रिक्शा मिलेंगे!"महिला बोली -"कोशिश तो करो। बारिश अब नहीं रुकेगी। मैं कब तक यहाँ अकेली बैठीं रहूंगी!"? अर्नब ने सोचा कि यह आवाज उसे बहुत पहले से परिचित लगा । इसे नजाने कितनी बार अलग-अलग तरीकों से सुना है। बहुत समय पहले की बात लगती है।"सुनो, रिक्शे वाले से कहना मैं विश्वास नगर जाउंगी।"
हालांकि स्टेशन के बाहर तीन रिक्शा खड़े थे, लेकिन उनमें से किसी का भी चालक नहीं मिला। थोड़ा आगे जाने पर अर्नबने देखा कि तीन लोग एक दुकान की छत के नीचे उकडू होकर बैठ कर बीड़ी पी रहे थे । लगभग दुगने किराए से एक रिक्शे वाले को बिश्वाश नगर चलने के लिए राजी किया।"चलो, तुम्हारा रिक्शा मिल गया है। तुम मुझे अपना बैग दे दो।"
"तुम कहाँ जाओगे?" महिला ने धीरे से पूछा।
अर्नब ने कहा "हरिहरपुर।"
महिला ने पूछा "हरिहरपुर में किसके घर जाना है?"
इस सवाल से अर्नब थोड़ा शर्मिंदा हुआ तो उसने सवाल पूछा, "क्या आप हरिहरपुर में किसी को जानते हैं?""मेरे पिता का घर है वहां। मेरे पिता का नाम बिनॉय घोषाल है।"अर्णब अचानक रुक गया। वह आवाज जिसे वह स्मृति की धूल में इतनी देर से खोज रहा था। हाथ की हथेली में अचानक उसका नाम आ गया। उसके गले से एक आश्चर्य निकला।
"मीतू...!" मिताली, जो कभी अर्नब के तन-मन पर राज करती थी, वह नाम जो एक दिन अर्नब की नसों की धमनियोमे में अश्वमेध यज्ञ के घोड़े की तरह दौड़ता था, जिसका समय अभी भी रुक जाता है जब वह इसके बारे में सुनता है, तो एक दिन सड़क अचानक बदल जाती है कोई कारण नहीं, बहाने के लिए कोई जगह नहीं है सामने खड़ा है एक अपंग रात, एक दुबली पतली महिला, नवजात शिशु गोद में लिए ।
मिताली का गला आश्चर्य से रुंध गया। "अनु, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं तुम्हें इस जीवन में फिर से देख पाउंगी" "कैसी हो तुम? तुम कैसी दिखती हो?" अर्नब को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ ।मिताली एक सूखी मुस्कान के साथ,बोली "आप देख सकते हैं कि मैं कैसी हूं। आप बॉम्बे में ठीक हैं, मैं सुन सकती हूं, मैं जान सकती हूं।" "मेरी सारी ज़िंदगी मैंने केवल बाहर ही देखा है!" अर्नब अपनी आह नहीं छिपा सके।दोनों चुपचाप चलने लगे। घर के चाला पर बारिश की आवाज, मेढको की टर्राना और बादलों की कभी-कभार गर्जना, ये सब सन्नाटे को झकझोरने की कोशिश करते दिख रहे थे ।रिक्शा में बैग रखते हुए अर्नब ने कहा, "लेकिन मैंने तुम्हें बहुत सारे पत्र दिए, मीतू, तुमने उनमें से किसी का भी जवाब नहीं दिया । मैंने व्यर्थ में ही तुम्हे पत्र लिखा। बाद में एक दिन मैंने सुना कि तुम्हारी शादी हो गई है।
मिताली अर्नब का एक हाथ अपने हाथ में लेती है और कहती है, "अनु, तुमने जवाब देने से क्यों मना कर दिया! ठीक हो जाओ। मैं अभी चलती हूँ?" लैंप पोस्ट की मंद रोशनी में अर्णव देखता है कि कैसे रिक्शा धीरे-धीरे अंधेरे में गायब हो रहा है। अब बारिश की तीव्रता कम हो गई है। बादलों की गर्जना अब सुनाई नहीं देती। भीषण बारिश में अर्णब अकेला खड़ा रहता है।कृष्णागंज से हरिहरपुर तक की सड़क करीब दस किलोमीटर है। अर्नब ने बड़ी मुश्किल से एक रिक्शा वाले को बारिश रुकने के बाद चलने के लिए राजी किया।
घर पहुंचने में बहुत देर हो चुकी थी । उसने देखा मां आज भी बरामदे में इंतजार कर रही है।अर्नब नहाने के बाद बाहर आया और डाइनिंग टेबल के कुर्सी पर बैठ गया। बहुत भूख लगी थी । माँ ने खाने की मेज पर भोजन की व्यवस्था की थी । हालांकी माँ ने फोन किया था, और अर्नब ने कहा था कि घर आने में बहुत देर हो जाएगी। नहीं तो माँ को बहुत चिंता होती है। बरसात के दिन काम करने वाली मौसी शाम को चली गई, जब अर्नब नहाने के लिए गया तो उसने अकेले ही सारा खाना गर्म कर दिया। फिर जब अर्नब खाना खाने बैठेंगा तो मां दुनिया भर की कहानी सुनाएगी। अर्नब सोचता है, पिता की मृत्यु के बाद से मेरी मां का बात करना थोड़ा बढ़ गया है। पूरे गांव की खबर मां विस्तार से बताएगी, अर्नब को अच्छा न लगे तो भी सुनता है!
"आप पूरी रात क्यों जागती हो ? अगर आप ठीक से नहीं सोगी, तो आपका रक्तचाप फिर से बढ़ जाएगा।" अर्नब ने आलू को सूप में रगड़ते हुए कहा।"अगर एक-आध दिन के लिए थोड़ी सी भी अनियमता करती है, तो कुछ नहीं होगा। इसके अलावा, वह आज पूरे दिन अच्छे मूड में नहीं है।"
"क्यों, क्या हुआ?" अर्नब जानता है कि इस बार मां गांव में किसी की दुख भरी कहानी सुनाएगी।
" क्या हुआ बिनॉय बाबू की बेटी मिताली, तुम उसे पहचानते हो, आज सुबह मर गई.है .."
समय बीतता जा रहा है। वह व्याकुल निगाहों से अपनी माँ की ओर देखता रहता है। माँ से एक शब्द नहीं सुना जाता है।
" दो साल पहले कृष्णागंज में मैरिज हॉल में । बिनॉय बाबू ने अपनी बेटी की शादी खूब धूमधाम और शानदार तरीके से की। कितनी खूबसूरत लड़की, उसका स्वभाव कितना अच्छा था।अर्नब स्थिर हो चुका है। उसके कानों में एक शब्द भी नहीं घुस रहा था , झिंगुर की आवाज़ जोर-जोर से कानो में आ रही थी, मानो कोई उसका हाथ छुड़ाने की कोशिश कर रहा हो। कहते हुए मैं जा रही हूँ .अर्नब