दोस्ती -पार्ट--1 13/6/22
रंजीत बाबू को सेवानिवृत्त हुए पांच साल हो गए हैं। काम के दौरान उन्होंने सोचा था कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें काफी आराम मिलेगा। लेकिन आजकल,नजाने क्यू रंजीत बाबू का समय कट्ता ही नहीं। बेटा -बहु, नाती-पोते सभी अपने अपने काम में ब्यस्त हैं। पहले जब पत्नी ज़िंदा थी तब उनके साथ बहस करने में बहुत समय बितजाती थी । कुछ साल पहले वह स्वर्गवासी हो गई तब से लगता है कि रंजीतबाबू अकेले रह गए हैं। सुबह टहलने के बाद वह सब्जी बाजार कर लाते । फिर दिन भर अखबार के पन्ने पलटते रहते।वह भी लगभग याद हो जाता । टीवी पर भी बहु का कब्जा है। एक के बाद एक सीरियल का रिपीट टेलीकास्ट होता रहता है वहीं जारी है। आजकल रंजीत दोपहर को लेटे हुए भी सो नहीं पाते हैं। इसलिए कुछ दिनों से वह चार बजे पार्क में आजाते हैं । उनके दोस्त केदारबाबू वहां आते हैं,रंजीत कुछ समय उनके साथ बात करते हुए बिताया करते हैं ।
आज चार बजे रंजीतबाबू पार्क पहुंचे। केदारबाबू अभी नहीं आए थे । वह भी चार साल पहले सेवानिवृत्त हुए थे। वह भी विधुर है। दस मिनट में केदारबाबू पार्क में आ गए। वह बहुत मजाकिया स्वभाव के आदमी हैं। केदारबाबू बेंच पर बैठे तो रंजीतबाबू ने पूछा,
" आज तुम इतने अच्छे मूड में हो?" क्या बात है? "
- क्यू मेरा चेहरा हमेशा तुम्हारे जैसा उदास होना चाहिए ?
रंजीतबाबू ने और कोई उत्तर नहीं दिया।
अचानक टिंग की आवाज आई। रंजीत बाबू थोड़ा हैरान हुए। केदारबाबू ने फौरन जेब से मोबाइल फोन निकाला । फिर उसमें नजाने क्यासब टाइप करते समय कभी-कभी उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती थी । रंजीतबाबू एक नजर से केदारबाबू पर निगाह रखे हुए थे। थोड़ी देर बाद केदारबाबू ने मोबाइल फोन अपनी जेब में रख लिया। रंजीतबाबू यह जानने के लिए उत्सुक थे कि केदारबाबू इतने लंबे समय से क्या लिख रहे थे। तभी उसे मौका मिला - अच्छा, मुझे बताओ कि तुम इतने लंबे समय से फोन पर क्या कर रहे थे ?
- मैं फेसबुक कर रहा था।
- फेस बुक? वह क्या है? पढ़ने वाली या देखने वाली ?
-केदार बोला अरे बुद्धू ! फेसबुक का मतलब मुख-पुस्तिका। दस बजे से पांच बजे तक कलम पीसना और सबेरे सब्जी खरीदने के अलावा दुनिया को नहीं जानते ।
रंजीत बोला - सही बात है। कलम को रगरते रगरते ही जिंदगी बीत गई है, इसलिए अब समय बिताना मुश्किल हो गया है।
- अच्छा, अब तुमभी फेसबुक करना शुरू करो और देखना समय कैसे बीत जाता है ।
- लेकिन मैं इसके बारे में कुछ नहीं जानता।
- इसमें क्या? मै तुम्हे सिखाऊंगा। हालांकि, यह मानधतता के जमाने वाला फ़ोन से यह काम नहीं होगा ! आपको एक स्मार्ट फ़ोन खरीदना होगा ।
- सही बात है।
अगले दिन केदारबाबू को साथ लेकर रंजीतबाबू ने एक स्मार्टफ़ोन ख़रीदा। फिर केदारबाबू ने उसमें फेसबुक अकाउंट खोला। और सब कुछ चलना सिखाया।
धीरे-धीरे रंजीतबाबू ने भी फेबू को काफी अच्छे तरीके से चलाना सीख लिया । अब रंजीतबाबू का समय ब्यतीत करना आसान हो चुका है। यह फेबू भी एक अलग दुनिया है। धीरे-धीरे यहां कई रिश्ते बन गए। भाई, बहन, दादा, दोस्त और यहां तककि पोते-पोतियां भी।
To continue--
दोस्ती-पार्ट-2
यहीं पर रंजीतबाबू की पहचान पूरबी नाम की एक महिला से होती है । वह एक स्कूल टीचर थी । मात्र छह महीने पहले सेवानिवृत्ति हुई हैं। पहले कुछ दिनों तक गुड मॉर्निंग और गुड नाईट के अलावा कोई शब्द आदान प्रदानं नहीं हुआ। फिर धीरे-धीरे बातचीत शुरू हो जाती है। एक दूसरे के बारे में जान पाते हैं।
पूरबी--30 साल की उम्र में पूरबी के पति की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। उसे अपने पति की नौकरी मिल जाती है। फिर उसने नौकरी संभाली और अकेले ही दो बच्चों की परवरिश की। अब उनका लड़का सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। वह अपनी पत्नी और बेटे के साथ कनाडा में रहता हैं। पूरबी की बेटी MBA की पढ़ाई कर रही है। वह भी अपने पति और पुत्री के साथ मुंबई में रहती हैं। पूरबी देवी घर में बिल्कुल अकेली हैं। इससे पहले वह अपने काम में व्यस्त थी । लेकिन वह समय निसंग होकर बर्बाद नहीं करना चाहती थी । अतः समय बिताने के लिए, उसी स्कूल की शिक्षिका अतसी,जो पूरबी से काफी छोटी है।वह पूरबीदेवी से फेसबुक का उपयोग करने के लिए कहती है। तभी से उनका फेबू शुरू हो गया था।
रंजीतबाबू और पूरबीदेवी एक दूसरे के बारे में जानने के बाद दोस्त बन गए। यह कुछ दिनों के लिए सिर्फ एक परिचित है, लेकिन यह एक लंबे परिचित की तरह लगता है , यह अजीब दुनिया! शायद दोनों में से कोई एक दूसरे को कभी नहीं देखें हैं लेकिन रंजीतबाबू को लगता है कि वे काफी करीब हैं । जिसके साथ मन की सारी बातें खुल कर साझा कर सकते हैं । पूरबीदेवी विलाप करती है की, होली-दुर्गोत्सब में , बच्चे यहाँ किसी चीज़ के लिए भी नहीं आते हैं। अतः पूरबी देवी को यह भी नहीं समझ में आता कि त्यौहार कब आते हैं और कब समाप्त होते हैं! रंजीतबाबू भी पछताते हैं। उनका बेटा, पोता, पोती एक ही घर में रहते हैं, लेकिन वे अपने परिधि में रहते हैं। बहु कमरे में खाना समय पर पहुंचा देती है, इसके अलावा कोई खबर नहीं रखती । तभी वह सभी के साथ होते हुए भी अकेले है। इस तरह दो अकेले लोग एक दूसरे के साथी बन जाते हैं।
एक दिन जब रंजीतबाबू नहाने के लिए बाथरूम गए तो उनकी बहु रीमा उन्हें खाना देने के लिए उनके कमरे में आई। उसी समय रंजीतबाबू के फोन पर पूरबीदेवी का एक संदेश आया। जिज्ञासा से, रीमा पुराने संदेशो को भी खोलती है। फिर एक-एक करके पिछले संदेशों को पढ़ती जाती है। जब उसने रंजीतबाबू को बाथरूम से बाहर आने कीआहट सुनाइदी उस बीच रीमा ने फोन छोड़ दिया और कमरे से निकल गई ।
रीमा रात में रंजीतबाबू के बेटे सुदीप्त को सब कुछ बताती है। सुदीप्त भी स्वीकार करते हैं कि पिता का किसी स्त्री के साथ संबंध नहीं होना चाहिए। अगले दिन सुबह सुदीप्त ने अपने पिता से इस बारे में बात की, महिला के बारे में जानना चाहा।
रंजीतबाबू ने कहा कि वह एक सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक हैं, उनकी फेसबुक र्फ्रेड हैं।यह सुनकर सुदीप्त ने कहा, "पिताजी, क्या आपको इस उम्र में ऐसा काम करने में शर्म नहीं आती? समाज में हमारा मान सम्मान है। और आप इस तरह फेबु नहीं खेल सकते।
जवाब में, रंजीतबाबू ने कहा, "क्या तुम यह बात का ख्याल रखते हो जब तुम दोस्त बनाते हो या किसी से बात करते हो? क्या तुम आधुनिक युग के संतान नहीं हो? यह तुम्हारी आधुनिक मानसिकता है?, चिंता न करो, मैं तुम्हारे सम्मान को कलंकित न करने की व्यवस्था करूंगा। "अचानक रंजीतबाबू अपने ही घर में अपरिचित और अछूत हो गए। उन्हें देखकर हर कोई उनसे दूर रहने लगा था। सबके इस व्यवहार से रंजीतबाबू बहुत अपमानित महसूस करने लगे थे। उसे समझ में नहीं आता कि यह परहेज क्यों? अगर उनका कोई पुरुष मित् होता, तो, क्या वे ऐसा व्यवहार करते? शायद ऩही।
अगली सुबह रीमा जब चाय देने गई तब उसन रंजीत बाबू को नहीं देखा। उसने टेबल पर एक पत्र देखी। इसमें लिखा था, पुत्र 'मैंने आपकी मर्यादा को बनाए रखने के लिए यह घर छोड़कर जा रहा हूँ । मैं जहां भी रहूंगा ठीक रहुंगा। खुश रहो "
रीमा ने पत्र को उठालिया और उसे सुदीप्त को दिखाया, तो उसने पत्र को भावहीन चेहरे के साथ रीमा को लौटा दिया और उसे बचाने में लगी हुई थी।फिलहाल रहने के लिए रंजीतबाबू एक मेस हाउस में आए हैं। और एक वृद्धाश्रम ढूंढकर वहां जाना चाहते हैं ।
रंजीत बाबू का फोन पिछले तीन दिनों से बंद है। पिछले कुछ दिनों से उनके मन में बस एक ही सवाल परेशान कर रहा है कि जिस लड़के को इतना प्यार से पाला गया, पढ़ा-लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा किया गया, आज पिता उसके लिए इतना अनाबश्यक हो गया है!
धीरे-धीरे मन शांत हो गया और उन्होंने पूरबीदेवी के बारे में सोचा। वह पिछले तीन दिनों से कोई खबर ना मिलने के वजह से बहुत कुछ सोच रही होगी ! उसे सूचित करने की आवश्यकता है। यह सोचकर रंजीत बाबू ने फोन ऑन कर दिया। तुरंत ही पूरबीदेवी के कुछ संदेश प्रविष्ट हो जाते हैं। जिनमें से प्रत्येक में गहरी चिंता का आभास होता है। रंजीतबाबू ने पूरबीदेवी को एक संदेश भेजा और उसे सब कुछ बताया। यह सब जानने के बाद पूरबीदेवीका मन भी खराब हो गया। उन्हें मेस का पता रंजीत बाबू से मिला।
अगले दिन पूरबीदेवी स्वयं उस मेस में आई । पहली नजर में रंजीत बाबू को उन्हें पहचानने में कोई दिक्कत नहीं हुई। कहा "यह सब क्या है? आप क्यू यहां रह रहें हैं? "
पूरबीदेवी- मैं आपको लेने आइ हूँ । बेशक, अगर आपको कोई आपत्ति न हो तो ।
- अपना सारा सामान साथ लें?
रंजीत बाबू--कहाँ ?
पूरबीदेवी- और कहाँ? मेरे घर।
रंजीत बाबू - वह कैसे? समाज क्या कहेगा?
- समाज! परिवार!
साल दर साल निकलता है। बच्चों के आने का समय किसी के पास नहीं है। और इतने बड़े घर में मर भी जाए तो समाज उसकी तरफ नहीं देखेगा। कम से कम हम तो एक दूसरे के सुख-दुख में भागीदार तो रहेंगे। क्या उसके लिए दोस्ती काफी नहीं है?
रंजीत बाबू को और कोई जवाब नहीं मिला। पूर्वी देवी को रोकने के लिए !
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