Friday, January 12, 2018

रिश्ता

 रिश्ता
गावं में एक संभ्रांत बिधवा ब्रामहन महिला सुलोचना करीब साठ साल की उम्र थी अकेले रहती थी ! पति गुजर चुके थे ! चतुर्बेदी निवास में धन दौलत की कोई कमी नहीं थी !पुराने ज़माने का नौकर हरिया आज भी घर का काम करता था !एक बिधवा स्त्री जिसे कोई खास बीमारी न हो तो कोई खर्च भी नहीं था ! पति के रहते ही एकमात्र बेटे ने अन्य जाती में शादी किया तो घर से बेदखल किया था !बेटा दुखी होकर कंही और जाकर अपने पत्नी के साथ रहता था ! सुना था उसकी एक बेटी हुई है और बेटा बीमारी से चल बसा है ! बहु अकेले बेटी को पालती है ! मन तो होता था की बहु के घर जाकर पोती को गोद में उठाऊ,उसे प्यार करू लेकिन समाज से डरती थी ! पुराने ज़माने का नौकर हरिया आज भी घर का काम करता है ! बुढ़िया दिन भर बगीचा और घर का देख भाल करती और दोपहर को थोड़ा दाल चावल पकाकर खा लेती थी ! शाम को पूजा पाठ कर ठाकुरजी का प्रसाद खाकर सो जाती थी !
इसतरह लक्षहीन बिना उद्देश्य के जीना भी क्या जीना ! वकील से मुलाकात कर बहु के नाम बासीहत तैयार कर रखा था ! सोचा था डाक से भेज दूगी नहीं तो वकील साहब से भिजवा दूंगी ! आज दोपहर पूजा के समय अचानक घंटी बजी, मन में सोचा कौन हो सकता है इस दोपहर को बुढ़िया से मिलने आया है ? हो न हो गांव के बच्चे शैतानी कर रहें हो या फिर कोई चंदा मांगने आ धमका हो ! फिर घंटी बजी तो भगवानजी से छमा मांगी, प्रभु पूजा छोड़ कर उठ रही हूँ माफ़ करना !
दरवाजा खोला तो देखा एक सूंदर सी लड़की परेशां सी कड़ी थी और बोली अम्मा एक गिलास पानी दो प्यास लगी है ! सुलोचना उस लड़की को अंदर आने को कहा ! चेहरा देखने से ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपना है !
सुलोचना ने लड़की को पानी पिलाया और कहा बेटी तुम्हारा नाम क्या है ? उसने कहा डॉक्टर सुलोचना ! मै इस
गांव की नई डाक्टर हूँ ! अभी अभी पोस्टिंग हुई है !मुझे एक किराये में घर चाहिए ! सुलोचना ने कहा मै तुम्हे डाक्टरनी कहु तो चलेगा ? नहीं आप मुझे बेटी कहिये जैसा आपने थोड़ीदेर पहले कहा था !मुझे अच्छा लगेगा !
ठीक है बेटी मै अकेले रहती हूँ तुम मेरे साथ रहो ! डाक्टरनी वही रहने लगी और हॉस्पिटल का काम सम्हाल लिया !सुलोचना ने गौर किया की डाक्टरनी की अंदाज़ उसके बेटे जैसा है जैसे प्रणाम करना , गले मिलना और कुछ ना कुछ सुलोचना के लिए लेके आना ! एकदिन डाक्टरनी सुलोचना के लिए एक साड़ी लेकर आई और माँ का पैर छुए और कहा माँ आज मुझे तनखा मिली है इसलिए साड़ी ले आई ! मना मत करना नहीं तो मै रोने लगूंगी ! सुलोचना बोली तू मेरे बेटा हिमाद्रि जैसा करती है और रोने लगी ! डाक्टरनी ने माँ को पलंग पर बैठाया
और पानी लाकर मा को पिलाया और आँखे पोंछ दिया !
सुलोचना रात भर सोचती रही कौन है यह लड़की ? जो मुझसे इतना प्रेम करती है ! सबेरे सुलोचना डाक्टरनी के हॉस्पिटल जाने के बाद, उसके कमरे में गई और पता लगाना चाहा कौन है यह लड़की ! उसने टेबिल पर रखा उसका फोटो देखा और देखती ही रह गई ! जैसे उसका बेटा हिमाद्रि लड़की बन कर उसके सामने खड़ी है, और कह रही है माँ मुझे पहचाना नहीं मै तेरा बेटा हिमाद्रि हूँ ! माँ समाज के लिए मुझे घरसे निकाला पर दिलसे कैसे निकालोगी ! सुलोचना खूब रोइ और जी भर कर रोइ और बोली बेटा यह मेरी जिंदगीकी सबसे बड़ी भूल थी मुझे माफ़ करदे ! मैं तो बहु से नाराज थी, उसने तुझे छिना है मुझसे ! सुलोचना ने फोटो फ्रेम को पीछे से खोला तो उसमे बेटा हिमाद्रि और बहु चेतना की फोटो थी ! अब उनको समझ में आया की डाक्टरनी उसके घर क्यू आई है ! बहु के मन में हमारे इस मकान का लोभ पैदा हो गया है और उसे हथियाने के लिए अपने बेटी को भेजा है !
शाम को घर आकर डाक्टरनी ने जैसे ही अपने कमरे में कदम रक्खा उसने देखा टेबल पर उसका पिता, माता और उसका अपना फोटो, फ्रेम के बहार निकाल कर अलग अलग रक्खा गया है ! उसे समझ में आ गया की उसका पिछ्ला इतिहास सुलोचना देवी को पता चल चूका है !इतने में हरिया ने आकर कहा मालकिन आपको अपने कमरे में बुलाया है ! लड़की उठी और पलंग के निचे से एक बंद मुँह का लोटा निकला और उसे लेकर ऊपर के कमरे में आ गई, और माँ को प्रणाम किया ! माँ ने बेटी को गले लगाकर खूब प्यार किया और बसिहतनामा
उसके हाँथ में देकर कहा ले यह मेरा संपत्ति घर द्वार सब कुछ तेरे माँ के नाम कर दिया है ले जाकर उसे दे दे !
बेटी ने कहा दादी अब तो यह काम तुम्हे ही करना होगा, क्यू की माँ अब यही पर है, दादी बोली यही पर ? पोती ने कहा यही पर कह कर अस्थि कलश के तरफ इशारा किया ! दादी ने पूंछा यह क्या है ? पोती ने कहा यह माँ की अस्थि कलश है, और कहा है यही उसका ससुराल है उसका अपना घर इस अस्थि को इस घर के आँगन में बिसर्जित करने को कहा है ! उसने मेरा नाम आपके नाम पर रखा ! वह आप से बहुत प्यार करती थी और आप की सेबा करना चाहती थी ! एक दिन मैंने देखा रत को वह मेरा पैर दबा रही थी, मैंने कहा अम्मा यह क्या कर रही हो ? वह बोली मैं अपने सास की पैर दबा रही हूँ ! वह कहती थी कभी न कभी तुम्हारी दादी हम लोंगो को अपने पास ले जाएगी ! मेरे पिताजी के स्वर्गबास के बाद उन्होंने मुझे पढ़ाया और डाक्टर बनाया मुझे इस घर के लायक बनाया ! और मुझे मरने से पहले कहा की मै तुम्हारे पास आकर रहूँ और आप का ख्याल रखु और आप की सेबा करू जो वह दुर्भग्यबश नहीं कर पाई !
इतना सुनते ही सुलोचना फुट फुट कर रोने लगी और बोली चेतना मुझे माफ़ कर दो मै ने तुम्हारे साथ घोर अन्याय किया है ! समाज तो आदमी ने बनाया है लेकिन तुम तो भगवान हो ! तुमने मेरे पोती को डाक्टर बना कर एक मिसाल कायम की है !
अब दादी का पूजापाठ पांच मिनट में होता है और पोती के लिए समय ही समय है ! घर का नाम अब चेतना निवास ! और घर के सामने चेतना का मूर्ति स्थापित की गई है
लेखक डॉ प्रदीप कुमार मोइत्रा

Friday, January 5, 2018

পৃথিবী বল্লভ

 ঐতিহাসিক প্রেমের গল্প -পৃথিবী বল্লভ [প্রথম পর্ব]
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বন্ধুগণ নমস্কার এবার আপনাদের একটা  ঐতিহাসিক প্রেমের গল্প -"পৃথিবী বল্লভ" শোনাতে যাচ্ছি আশাকরি আপনাদের বহুমূল্য সমর্থন পাবো !
  দাক্ষিণাত্য মালভূমি (প্লেটও)দক্ষিণ ভারতের একটি বিশাল মালভূমি যা যথাক্রমে বৃদ্ধি পায় উত্তরে ১০০ মিটার এবং দক্ষিণে ১০০০ মিটারেরও বেশি।ভারতীয় উপমহাদেশের এই ভূভাগের ভিতরে একটি উত্থিত ত্রিভুজ-আকার স্থান গঠন করে দক্ষিণ ভারতের দিকে ! এই মালভূমি দুটি পর্বত শ্রেণীর,দ্বারা বেষ্ঠিত পশ্চিম ঘাট এবং পূর্ব ঘাট গুলির মধ্যে অবস্থিত !

দাক্ষিণাত্য ভারতীয় ইতিহাসের সবচেয়ে উল্লেখযোগ্য কিছু রাজবংশ যেগুলি উত্পন্ন হয়েছিল তারা হলো- চোলা রাজবংশ, সাতাবাহানা রাজবংশ, ভ্যাকাটাকা রাজবংশ, চালুক্য রাজবংশ, রাষ্ট্রকূট রাজবংশ, পশ্চিম চালুক্য সাম্রাজ্য, বিজয়নগর সাম্রাজ্য এবং মারাঠা সাম্রাজ্য । ডেকান রাষ্ট্রকূট রাজবংশের রাজা দান্তিদুর্গ বা "দন্তিরইগুরগার" চালুক্য সাম্রাজ্য কে পরাজিত করে রাষ্ট্রকূট সাম্রাজ্যের (৭৩৫ -৭৫৬ শতাব্দী ) ভিত্তি স্থাপনা করেন ।"পৃথিবী বল্লভ" শিরোনাম রাষ্ট্রকূট রাজাদের দ্বারা সর্ব প্রথম ৮ম শতাব্দীর রাজা "দন্তিরইগুরগার" দ্বারা গৃহীত হয়েছিল,এবং তার উত্তরাধিকারীরা হিন্দু দেবতা বিষ্ণুর অনুরূপ হিসেবে বিবেচনা করতেন।
এই প্রেম কাহিনী সৃষ্টি হয়েছিল রাজা বকপতি মুঞ্জ আর চালুক্য রাজকন্যা মৃনালবন্তির মাঝে !
প্রস্তাবনা ভালোবাসা
একটি অনুভূতি এবং আবেগকেন্দ্রিক একটি অভিজ্ঞতা। বিশেষ কোন মানুষের জন্য স্নেহের শক্তিশালী বহিঃপ্রকাশ হচ্ছে ভালোবাসা। তবুও ভালোবাসাকে বিভিন্ন দৃষ্টিকোণ থেকে ভাগ করা যায়।
প্লেটোনিক ভালোবাসা
এ শব্দটির উৎপত্তি মূলত প্লেটোর "প্লেটোনিজম" মতবাদ থেকে ! হলো শুদ্ধতম ভালোবাসা যাতে কামনা বাসনা নেই। যাতে প্রেমিক-প্রেমিকা ভালোবাসার সর্ব্বোচ পর্যায়ে প্রবেশ করবে। ভালোবাসা বিভিন্ন রকম হতে পারে, যেমন: নিষ্কাম ভালোবাসা, ধর্মীয় ভালোবাসা, আত্মীয়দের প্রতি ভালোবাসা ইত্যাদি। আরো সঠিকভাবে বলতে গেলে, যে কোনো ব্যক্তি বা বস্তুর প্রতি অতিরিক্ত স্নেহ প্রায় সময় খুবই আনন্দদায়ক হতে পারে... এমন কি কোনো কাজ কিংবা খাদ্যের প্রতিও। আর এই অতি আনন্দদায়ক অনুভূতিই হলো ভালোবাসা।
রোমান্টিকতা পশ্চিমা বিশ্বের একটি বুদ্ধিবৃত্তিক ধারা বা আন্দোলনের নাম যা সাহিত্য, সঙ্গীত, চিত্রকলা, স্থাপত্য, সমালোচনা এবং ইতিহাস-লিখনের ক্ষেত্রে নতুন ধারার সৃষ্টি করে।রোমান্টিক সাহিত্যিকদের অনেকে সাদা খাতা সামনে রেখে মনে যা আসত তা-ই লিখে যেতেন। সাহিত্যের উৎস হিসেবে চেতন মনের তুলনায় অবচেতন মনকে প্রাধান্য দিতেন।রোমিও অ্যান্ড জুলিয়েট হচ্ছে প্রখ্যাত সাহিত্যিক উইলিয়াম শেকসপিয়র রচিত একটি বিয়োগান্তক নাটক, যা গড়ে উঠেছে দুজন প্রেমিক-প্রেমিকাকে কেন্দ্র করে।
 রবার্ট  স্টার্নবের্গ  [(৮/১২,১৯৪৯) মার্কিন  মনস্তত্ত্বিক, প্রফেসর  অফ  হিউমান  ডেভেলপমেন্ট  এটি  কর্নেল  ইউনিভার্সিটি ] ভালবাসাকে তিনিটি উপাদানের মধ্যে ভাগ করেছেন। সেই উপাদানটিকে একটি ত্রিভুজের মাধ্যমে প্রতিস্থাপন করেছিলেন। তিনটি উপাদান হল- আবেগ(যৌন অথবা রোম্যান্টিক আকর্ষণ), অন্তরঙ্গতা (গভীর অনুভূতি) এবং সহানুভূতি (শুধুমাত্র সম্পর্ককে রক্ষা করাই নয়, তাকে সসম্মানে এগিয়ে নিয়ে যাওয়া)।
সত্যি প্রেমের অনুভূতি এক অদ্ভুত অনুভূতি। প্রেমে পড়লেও জ্বালা আবার এর স্বাদ না নিলেও যেন মন ভরে না। তবে হরেক রকমের প্রেম বর্তমান আমাদের এই দুনিয়ায়। প্রেমে পড়ার সঠিক কোনও বয়স, ধর্ম,বর্ণ,ভাষা,  হয় না।জীবনের বিভিন্ন পর্যায় এসে প্রেমের বিভিন্ন সংজ্ঞার মানে বোঝা যায়। তবে আমাদের প্রসঙ্গের নায়ক নায়িকা বংগো সাহিত্যের বচন "পিরিতি কাঁঠালের আঠা, লাগলে পড়ে ছাড়ে না।"আওতায় এসে এই মিলন কে বিয়োগান্তক দিশা দিতে হয়ে ছিল !-
ডেকান রাষ্ট্রকূট রাজবংশের রাজা দান্তিদুর্গ উপদ্বীপীয় ভারতের আট শতকের ত্রিপক্ষীয় শক্তি সংঘর্ষ (৫৫৬ -৭৫৭ খ্রিস্টাব্দ), পল্লব (৩০০ -৮৮৮ খ্রিস্টাব্দ), কাঞ্চিপুরম এবং পান্ডেযার   মধ্যে ছিল। চালুক্য শাসকরা, রাষ্ট্রকূটস (৭৫৩ -৯৭৩ খ্রিস্টাব্দ ) দ্বারা উৎখাত হন। যদিও পল্লব ও পান্ডেযা উভয় রাজ্যই শত্রু ছিল, তবুও রাজনৈতিক কর্তৃত্বের জন্য প্রকৃত সংগ্রাম পল্লব এবং চালুক্যদের মধ্যে ছিল। রাষ্ট্রকূটদের উত্থান দক্ষিণ ভারতের ইতিহাসে নতুন যুগের সূচনা করে। একটি সর্ব- ভারতীয় সাম্রাজ্যের মুখ্যতা দক্ষিণে চলে গিয়েছিল। দক্ষিণ ভারতীয় রাজ্যগুলি এখন পর্যন্ত নর্মদা নদীর দক্ষিণ ও দক্ষিণে অঞ্চল শাসন করেছে। এটি ছিল রাষ্ট্রকূট,যাঁরা প্রথম গঙ্গা সমভূমিতে উত্তরের সাথে যুক্ত  করেছিলেন এবং বাংলার  পাল রাজাদের এবং গুজরাটের রাজপুতদের  বিরুদ্ধে সাফল্যের সাথে  বিজয়  অর্জন করেছিলেন।
পৃথিবী বল্লভ-মৃনালবন্তির প্রেম, আজকের কর্ণাটক অঞ্চলের  জনপ্রিয় বিয়োগান্তক লোক কথা ।  
 পৃথিবী বল্লভ
রাষ্ট্রকূট বংশের এক উত্তরাধিকারী ছিলেন তার নাম ছিল  শিয়াক এবং তার দুই পুত্র ছিল বকপতি মুঞ্জ আর সিন্ধুরাজ্ !
অনেকে মনে করেন বকপতিমুঞ্জ  শিয়াক রাজার দত্তক পুত্র ছিল ! শিয়াক বকপতিমুঞ্জ কে নিজের উত্তরাধিকারী নিযুক্ত করলেন কেননা সে জ্যেষ্ঠ পুত্র ছিল আর সংস্কৃত ,কলা আর সাহিত্যের  প্রচন্ড বিদ্বান ছিল ! এদিকে মুঞ্জের ছোট ভাই সিন্ধুরাজের পুত্র ভোজরাজা কে রাজ্য চালনা করার শিক্কা প্রদান করছিলেন ! রাজা মুঞ্জ ধনুর বিদ্যাতেও প্রখর আর সেই সময়কার শ্রেষ্ঠ ধনুর্বিদ ছিলেন সেই জন্য তার নাম পৃথিবী  বল্লভ পড়লো যদিও এই উপাধি রাষ্ট্রকূট বংশের 
পৃত্তি পুরুষদের উপাধি ছিল  !
 রাজা মুঞ্জের শাসন কালে তার অনেক শত্রু ছিল কিন্তু তাদের মধ্যে প্রধান শত্রু ছিল চালুক্য রাজ্ তেইপাল চালুক্য ! সে পাঁচ বার পৃথিবী-বল্লবকে আক্রমণ করেছিল আর পরাজিত হয়েছিল, কিন্তু ষষ্ঠ বার,  মুঞ্জ বিরক্ত হয়ে নিজেই  তেইপাল  কে আক্রমণ করতে গেলো ! মুঞ্জের মন্ত্রী রুদ্রাদিত্য   মুঞ্জ কে সাবধান করে ছিল যে রাজন আপনি খরস্রোতা গোদাবরী নদী পার করে তেইপালের রাজত্ত্বে প্রবেশ করবেন না কেননা ওই পাড়ে গেলে আপনার সৈনবল কম হয়ে যাবে ! আমরা পাঁচ বার যুধ্যে জয় লাভ করেছি এই জন্য যে আমরা নদীর এই পাড়ে ছিলাম আর আমাদের সৈন্য সংখ্যা চালুক্য দের থেকে বেশি ছিল ! এবার ঠিক তার উল্টোটা হবে ! রাজা মুঞ্জ নিজের পরাক্রমে এতো গর্বিত ছিল যে মন্ত্রীর  পরামর্শ প্রত্যাখ্যান করে নদী পার হয়ে গেলো আর তেইপাল  মুঞ্জ কে তিন দিক দিয়ে ঘিরে বন্দি করলো আর জেলে আটক করলো !
 চালুক্য রাজকুমারী মৃনালবন্তি প্রেম রাজা মুঞ্জের শাসন কালে তার অনেক শত্রু ছিল কিন্তু তাদের মধ্যে প্রধান শত্রু ছিল চালুক্য রাজ্ তেইপাল চালুক্য ! সে পাঁচ বার পৃথিবী-বল্লবকে আক্রমণ করেছিল আর পরাজিত হয়েছিল, কিন্তু ষষ্ঠ বার, মুঞ্জ বিরক্ত হয়ে নিজেই তেইপাল কে আক্রমণ করতে গেলো ! মুঞ্জের মন্ত্রী রুদ্রাদিত্য মুঞ্জ কে সাবধান করে ছিল যে রাজন আপনি গোদাবরী নদী পার করে তেইপালের রাজত্ত্বে প্রবেশ করবেন না কেননা ওই পাড়ে গেলে আপনার সৈনবল কম হয়ে যাবে ! আমরা পাঁচ বার যুধ্যে জয় লাভ করেছি এই জন্য যে আমরা নদীর এই পাড়ে ছিলাম আর আমাদের সৈন্য সংখ্যা চালুক্য দের থেকে বেশি ছিল ! এবার ঠিক তার উল্টোটা হবে ! রাজা মুঞ্জ নিজের পরাক্রমে এতো গর্বিত ছিল যে মন্ত্রীর পরামর্শ প্রত্যাখ্যান করে নদী পার হয়ে গেলো আর তেইপাল মুঞ্জ কে তিন দিক দিয়ে ঘিরে বন্দি করলো আর জেলে আটক করলো ! রাজা তেইপাল এর পূর্বে পাঁচ পাঁচ বার যুধ্যে পরাজিত হয়ে ছিল আর তাকে রাজা বকপতি মুঞ্জ কখনো কারাগারে বন্দি করেন নাই সেইজন্য তিনি মুঞ্জ কে রাজ্ প্রাসাদে নজর বন্দি করে রাখলেন ! তেইপালের ছোট বোনের নাম ছিল মৃনালবন্তি সে মুঞ্জকে দেখে তার রূপে মুগ্ধ হয়ে প্রেম নিবেদন করলো রাজা মুঞ্জও মৃনালের রূপে মুগ্ধ হলো ! এই ভাবে তাদের বেশ কিছুদিন কেটে কাটলো ! রাজা মুঞ্জ যেরকম বিদ্বান ছিলেন মৃণালিনীর রাজনীতির অত জ্ঞান ছিলোনা ! সে একদিন তার দাদাকে বললো সে রাজা মুঞ্জকে ভালোবাসে আর তাকেই বিয়ে করতে চায় ! তেইপাল ভগ্নি কে বোঝালো যে রাজা মুঞ্জ মৃণালিনী থেকে অনেক বড় ! আর বহুদিনের শত্রু !বোন বললো দাদা তুমি আমার বিয়ে দিয়ে দাও তোমাদের শত্রুতা শেষ হয় যাবে ! তেইপাল বোনকে বললো ঠিক আছে তোকে মুঞ্জ কতটা ভালোবাসে তার একটা প্রমান আমাকে দিতে হবে, মৃনালবন্তি এক কথায় রাজি হয় গেলো আর বললো তাই হবে ! মৃনাল এসে মুঞ্জ কে দাদার শর্তের কথা বললো ! মুঞ্জ বললো ঠিক আছে কিন্তু সেই প্রমান তৈরী করতে আমার ছয় মাস সময় লাগবে আর তোমাকে আমার কাছে সর্বক্ষণ থাকতে হবে ! তেইপাল মুনজের প্রস্তাবে রাজি হলো ! রাজা মুঞ্জ এই ছয় মাসে মৃনালবন্তির একটি বিশাল তৃমাত্রিক ছবি তৈরী করলো ! তখনকার দিনে খুব কম শিল্পীরা তৃমাত্রিক ছবি আঁকতে পারতেন ! সেই ছবি এতো প্রসিদ্ধি লাভ করলো যে তেইপাল অত্যন্ত খুশি হয়ে নিজে মৃনাল বন্তির বিবাহ মুঞ্জের সাথে সম্পন্ন করলেন ! এই বিখ্যাত ছবির কথা পৃথিবী-বল্লভের রাজ্যেও পৌছালো !তারা জানতে পারলেন তাদের রাজা জীবিত ! রাজা মুঞ্জের ভাতৃ পুত্র রাজা ভোজ তার বিশাল সেনা নিয়ে গোদাবরী নদীর ধরে এসে পৌছালো রাজা মুঞ্জ কে উদ্দার করতে ! কিন্তু খরস্রোতা নদীর উপর সেতু তৈরী করতে তারেদ পাঁচ বৎসর সময় লেগে গেলো আর এই দীর্ঘ সময়ের মধ্যে রানী মৃনালবন্তির তিন সন্তান উৎপন্ন হলো ! সেতু নির্মাণের পর রাজা ভোজ রাজা তেইপালকে সতর্ক বার্তা পাঠালেন যে অবিলম্বে রাজা মুঞ্জকে কারা-মুক্ত করে সসম্মানে ফেরত পাঠাতে ! রাজা তেইপাল উত্তর দিলেন তার কাকা রাজা মুঞ্জ এখানে বিবাহ করে তার পত্নী আর তিন পুত্রের সাথে সুখে আছেন আর তিনি ফেরত যেতে চান না ! আর যদি রাজা ভোজ চালুক্য আক্রমণ করেন তাহলে রাজা মুঞ্জ কে হত্যা করা হবে ! এই সম্বাদে রাজা ভোজ বিব্রত হয়ে তেইপাল কে আক্রমণ নাকরে সন্ধি পত্র পাঠালেন ! তেইপাল সন্ধি অগ্রাহ্য করাতে রাজা ভোজ চালুক্য রাজ্য আক্রমণ করলেন ! নিরুপায় হয়ে রাজা তেইপাল রাজা মুঞ্জ কে গোদাবরী তীরে বন্দি অবস্থায় স্ত্রী পুত্র সহ আনলেন আর রাজা মুঞ্জ কে বললেন তার ভাতৃপুত্রকে যুদ্ধ বন্দ করার নির্দেশ দিতে, প্রত্তুতরে রাজা মুঞ্জ বললেন তিনি রাজ্ বেশে আবির্ভূত না হলে তার নির্দেশ রাজা ভোজ মানবেন না ! অগত্যা রাজা তাইপাল রাজা মুঞ্জ কে রাজ্ বেশে প্রস্তুত করে গোদাবরীর কিনারে আনলেন আর রাজা ভোজ কে যুদ্ধ বন্দ করার নির্দেশ দিতে বললেন !রাজা মুঞ্জ উচ্চস্বরে নিজের শিষ্য আর ভাতৃপুত্র রাজা ভোজকে নির্দেশ দিলেন আক্রমণ করো,আক্রমণ করো,আক্রমণ করো ! সঙ্গে সঙ্গে হুড়হুড় করে রাজা ভোজের সেনা সেতু দিয়ে নদী পার হতে লাগলো আর এদিকে রাজা মুঞ্জ রাজা তাইপাল কে যুদ্ধ করার ইঙ্গিত করলেন কিন্তু তাইপালের সেনারা অন্যায় যুদ্বে রাজা মুঞ্জকে হত্যা করলেন !রানী মৃনালবন্তি এই মার্মিক হত্যা দেখে নিজের দাদার কাটারি নিয়ে নিজের বুকে সজোরে আঘাত করে সহমরণ অঙ্গীকার করলেন ! লেখক ড: প্রদীপ কুমার মৈত্র ৬/১/২০১৭
मृणालवती ने मुंज का प्लान अपने भाई को बता दिया था (सांकेतिक फोटो)