Friday, January 12, 2018

रिश्ता

 रिश्ता
गावं में एक संभ्रांत बिधवा ब्रामहन महिला सुलोचना करीब साठ साल की उम्र थी अकेले रहती थी ! पति गुजर चुके थे ! चतुर्बेदी निवास में धन दौलत की कोई कमी नहीं थी !पुराने ज़माने का नौकर हरिया आज भी घर का काम करता था !एक बिधवा स्त्री जिसे कोई खास बीमारी न हो तो कोई खर्च भी नहीं था ! पति के रहते ही एकमात्र बेटे ने अन्य जाती में शादी किया तो घर से बेदखल किया था !बेटा दुखी होकर कंही और जाकर अपने पत्नी के साथ रहता था ! सुना था उसकी एक बेटी हुई है और बेटा बीमारी से चल बसा है ! बहु अकेले बेटी को पालती है ! मन तो होता था की बहु के घर जाकर पोती को गोद में उठाऊ,उसे प्यार करू लेकिन समाज से डरती थी ! पुराने ज़माने का नौकर हरिया आज भी घर का काम करता है ! बुढ़िया दिन भर बगीचा और घर का देख भाल करती और दोपहर को थोड़ा दाल चावल पकाकर खा लेती थी ! शाम को पूजा पाठ कर ठाकुरजी का प्रसाद खाकर सो जाती थी !
इसतरह लक्षहीन बिना उद्देश्य के जीना भी क्या जीना ! वकील से मुलाकात कर बहु के नाम बासीहत तैयार कर रखा था ! सोचा था डाक से भेज दूगी नहीं तो वकील साहब से भिजवा दूंगी ! आज दोपहर पूजा के समय अचानक घंटी बजी, मन में सोचा कौन हो सकता है इस दोपहर को बुढ़िया से मिलने आया है ? हो न हो गांव के बच्चे शैतानी कर रहें हो या फिर कोई चंदा मांगने आ धमका हो ! फिर घंटी बजी तो भगवानजी से छमा मांगी, प्रभु पूजा छोड़ कर उठ रही हूँ माफ़ करना !
दरवाजा खोला तो देखा एक सूंदर सी लड़की परेशां सी कड़ी थी और बोली अम्मा एक गिलास पानी दो प्यास लगी है ! सुलोचना उस लड़की को अंदर आने को कहा ! चेहरा देखने से ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपना है !
सुलोचना ने लड़की को पानी पिलाया और कहा बेटी तुम्हारा नाम क्या है ? उसने कहा डॉक्टर सुलोचना ! मै इस
गांव की नई डाक्टर हूँ ! अभी अभी पोस्टिंग हुई है !मुझे एक किराये में घर चाहिए ! सुलोचना ने कहा मै तुम्हे डाक्टरनी कहु तो चलेगा ? नहीं आप मुझे बेटी कहिये जैसा आपने थोड़ीदेर पहले कहा था !मुझे अच्छा लगेगा !
ठीक है बेटी मै अकेले रहती हूँ तुम मेरे साथ रहो ! डाक्टरनी वही रहने लगी और हॉस्पिटल का काम सम्हाल लिया !सुलोचना ने गौर किया की डाक्टरनी की अंदाज़ उसके बेटे जैसा है जैसे प्रणाम करना , गले मिलना और कुछ ना कुछ सुलोचना के लिए लेके आना ! एकदिन डाक्टरनी सुलोचना के लिए एक साड़ी लेकर आई और माँ का पैर छुए और कहा माँ आज मुझे तनखा मिली है इसलिए साड़ी ले आई ! मना मत करना नहीं तो मै रोने लगूंगी ! सुलोचना बोली तू मेरे बेटा हिमाद्रि जैसा करती है और रोने लगी ! डाक्टरनी ने माँ को पलंग पर बैठाया
और पानी लाकर मा को पिलाया और आँखे पोंछ दिया !
सुलोचना रात भर सोचती रही कौन है यह लड़की ? जो मुझसे इतना प्रेम करती है ! सबेरे सुलोचना डाक्टरनी के हॉस्पिटल जाने के बाद, उसके कमरे में गई और पता लगाना चाहा कौन है यह लड़की ! उसने टेबिल पर रखा उसका फोटो देखा और देखती ही रह गई ! जैसे उसका बेटा हिमाद्रि लड़की बन कर उसके सामने खड़ी है, और कह रही है माँ मुझे पहचाना नहीं मै तेरा बेटा हिमाद्रि हूँ ! माँ समाज के लिए मुझे घरसे निकाला पर दिलसे कैसे निकालोगी ! सुलोचना खूब रोइ और जी भर कर रोइ और बोली बेटा यह मेरी जिंदगीकी सबसे बड़ी भूल थी मुझे माफ़ करदे ! मैं तो बहु से नाराज थी, उसने तुझे छिना है मुझसे ! सुलोचना ने फोटो फ्रेम को पीछे से खोला तो उसमे बेटा हिमाद्रि और बहु चेतना की फोटो थी ! अब उनको समझ में आया की डाक्टरनी उसके घर क्यू आई है ! बहु के मन में हमारे इस मकान का लोभ पैदा हो गया है और उसे हथियाने के लिए अपने बेटी को भेजा है !
शाम को घर आकर डाक्टरनी ने जैसे ही अपने कमरे में कदम रक्खा उसने देखा टेबल पर उसका पिता, माता और उसका अपना फोटो, फ्रेम के बहार निकाल कर अलग अलग रक्खा गया है ! उसे समझ में आ गया की उसका पिछ्ला इतिहास सुलोचना देवी को पता चल चूका है !इतने में हरिया ने आकर कहा मालकिन आपको अपने कमरे में बुलाया है ! लड़की उठी और पलंग के निचे से एक बंद मुँह का लोटा निकला और उसे लेकर ऊपर के कमरे में आ गई, और माँ को प्रणाम किया ! माँ ने बेटी को गले लगाकर खूब प्यार किया और बसिहतनामा
उसके हाँथ में देकर कहा ले यह मेरा संपत्ति घर द्वार सब कुछ तेरे माँ के नाम कर दिया है ले जाकर उसे दे दे !
बेटी ने कहा दादी अब तो यह काम तुम्हे ही करना होगा, क्यू की माँ अब यही पर है, दादी बोली यही पर ? पोती ने कहा यही पर कह कर अस्थि कलश के तरफ इशारा किया ! दादी ने पूंछा यह क्या है ? पोती ने कहा यह माँ की अस्थि कलश है, और कहा है यही उसका ससुराल है उसका अपना घर इस अस्थि को इस घर के आँगन में बिसर्जित करने को कहा है ! उसने मेरा नाम आपके नाम पर रखा ! वह आप से बहुत प्यार करती थी और आप की सेबा करना चाहती थी ! एक दिन मैंने देखा रत को वह मेरा पैर दबा रही थी, मैंने कहा अम्मा यह क्या कर रही हो ? वह बोली मैं अपने सास की पैर दबा रही हूँ ! वह कहती थी कभी न कभी तुम्हारी दादी हम लोंगो को अपने पास ले जाएगी ! मेरे पिताजी के स्वर्गबास के बाद उन्होंने मुझे पढ़ाया और डाक्टर बनाया मुझे इस घर के लायक बनाया ! और मुझे मरने से पहले कहा की मै तुम्हारे पास आकर रहूँ और आप का ख्याल रखु और आप की सेबा करू जो वह दुर्भग्यबश नहीं कर पाई !
इतना सुनते ही सुलोचना फुट फुट कर रोने लगी और बोली चेतना मुझे माफ़ कर दो मै ने तुम्हारे साथ घोर अन्याय किया है ! समाज तो आदमी ने बनाया है लेकिन तुम तो भगवान हो ! तुमने मेरे पोती को डाक्टर बना कर एक मिसाल कायम की है !
अब दादी का पूजापाठ पांच मिनट में होता है और पोती के लिए समय ही समय है ! घर का नाम अब चेतना निवास ! और घर के सामने चेतना का मूर्ति स्थापित की गई है
लेखक डॉ प्रदीप कुमार मोइत्रा

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